शनिवार, 31 जनवरी 2009

सरस्वती पूजा ३१ जनवरी २००९

आज सरस्वती पूजा है ईस अवसर पर सभी को बधाई आज माँ शारदे की वंदना करते हैं -
माँ शारदा की स्तुति
माँ शारदे !
कहाँ तू वीणा बजा रही हैं,
किस मंजु ज्ञान से तू जग को लुभा रही हैं,
किस भाव में भवानी तू मग्न हो रही है,
विनती नहीं हमारी तू क्यों माँ सुन रही है,
हम दीन बाल कब से विनती सुना रहें हैं,
चरणों में तेरे माता हम सिर झुका रहे हैं,
अज्ञान तुम हमारा माँ शीघ्र दूर कर दो,
द्रुत ज्ञान शुभ्र हममें ओ वीणा पाणिभर दो,
बालक सभी जगत के सूत मातु हैं तुम्हारे,
प्राणों से प्रिय तुम्हें हम पुत्र सब दुलारे,
हमको दयामयी ले निज गोद में पढाओ,
अमृत जगत का हमको माँ शारदा पिलाओ,
मातेश्वरी ! सुनो अब सुंदर विनय हमारी,
कर दया दृष्टी हर लो , बाधा जगत की सारी

सरस्वती वन्दना
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता,
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं,
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌,
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

सोमवार, 7 अप्रैल 2008

जाती पाती पर घमासान - राजनितिक रोटी तो नहीं सेंकी जा रही?

आज कल जाती पाती पर खूब घमासान मची हुई है। क्या ये जरूरी है? कहीं हम अपनी बात को सिद्ध कराने के लिए बेकार में जिरह तो नहीं कर रहे? खैर किसी भी प्रकार की जाती पाती का मैं घोर विरोध करता हूँ। जाती पाती मैं केवल विवाह शादी टाक ही सीमित रखता हूँ। उससे ज्यादा नहीं। लेकिन जाब कोई जाती पाती के नाम पर रोटी सेंकने लगता है, तो बड़ा गन्दा लगता है। जाती पाती के लेखो पर हुए टिपण्णी को राजनितिक रूप देने की कोशिश होने लगी।
पटना के हिंदुस्तान में मैंने लेख पढ़ा। बहुत अस्चार्य हुआ की पटना में इतनी जाती वदिता अभी जमी हुई है। पत्रकार महोदय दवाई खरीदने जाते हैं तो लोग उनसे जाती पूछने लगते हैं और दवाई लिखने वाले का जाती तक बताने लगते हैं। कितनी हास्यास्पद बात है। समाचार के अनुसार कभी कभी डॉक्टर कुछ जीवन रक्षक दवाई tab तक नहीं likhate जब तक की marij की जान ना जाने लगे। क्यों डॉक्टर इतने nirdayi बनते जा रहे हैं? क्यों dukandar दवाई देने से ज्यादा दवाई लिखने वाले की जाती batane में लगा रहता है?
कभी कभी लोग वही बोलते हैं जो हम सुनना चाहते हैं। जाती पाती से हम कब ऊपर uthenge?
गाँव में लोग किसी को अपनी जाती से निकलते hain तो उसे कुजात कह जाता है। कहीं ये जाती के दलाल कुछ दिन में fatawa ना nikalane लगे की अगर amuk जाती की dava खरीदी गयी तो खरीदने वाले को कुजात निकल दिया जाएगा।
कब sudharega Bihar? जाती की हवा देते rahane से क्या लोग जाती के changul से निकल payenge?

गाँव देहात की बातें!!

दोस्तों मैं भी अपना और अपने गाँव देहात का बात ब्लॉग पर रखना चाह रहा था। उसी उद्देश्य असे मैंने ये ब्लॉग बनाया है। उम्मीद है मैं इस ब्लॉग के द्वारा गाँव देहात की बातें आप तक पंहुचा सकूँगा। मेरी हिन्दी भाषा पर पकड़ उतनी मजबूत अथवा यूं कहिये की एक दम नहीं है। इसलिए मेरी लेखनी में त्रुटी हो टू मुझे माफ़ करेंगे। इसके अंदर की गहराई को पढिएगा और भाषा सम्बन्धी दोषों को ध्यान मत दीजियेगा।
धन्यवाद
उपाध्यायजी